भेट मेरे मित्र को

एक भेट मेरे मित्र को सालो बाद अपने घर अपना बेटा होने की ख़ुशी में ,
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
मेरे मित्र ,
मेरे पास दुवाओं के सिवा ,
कुछ भी नहीं तुम्हे देने को ,
जानती हूँ सालो की इस वेदना को भोगा हैं ,
तुम्हारी पत्नी ने ,तुमने ,
मेने कँहा था तुमसे की ईश्वर जो भी देता हैं अपनी मर्जी से,
वो बहुत खुबसूरत और मासूम होता हैं |
और तुम लड़ते रहे मेरे ईश्वर से हमेशा .

वो बहुत कठिन  परीक्षाएं लेता हैं ,
खुशनसीब हो जल्दी सफल होगये .
तुम उसकी परीक्षाओं में तुम .
ईश्वर इसी खूबसूरती से सदा तुम्हरा जीवन भरा रखे |
बस कभी अपने विशवास को यूँ हिलने नहीं देना ,
क्योकि अभी तो जीवन की बहुत परीक्षाएं  बाकी हैं मेरे मित्र !
मेरी उस मासूम बहन को बहुत स्नेह देना |
 तुम्हारे चाँद की सारी बलाएँ में अपने सर लेती हूँ | 
सदा यूँ ही खुश रहो ,अपने अनुराग को यूँ ही सहेजते रहो .
,मुस्कराते रहो फूलो की तरह

अनुभूति
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मेरे कन्हियाँ!
केसे पुकारू तुम्हे ?
जितना रोम -रोम मुझमे बसे थे तुम ,
बूंद -बूंद इन अखियन से ,
निकलकर बहे जाते हो ,
केसे कहू तुम्हे की तुम्हे की ,
किस  तरह तुम्हे ,
मेरे तन , मन से निकाला गया हैं |
मुझे इस दुनिया के पुरुष ने ,
अपनी अधीनता का एहसास दिलाया हैं |
बह जाओ अब जीवन से ,बह जाओ |
तुम ने तो मुझे कब का भुला दिया था कान्हा!
में ही बांधे बेठी थी तन ,मन की ये डोर '
और तुमने मुझेकिसी न किसी रूप में आकर मुझे झकोर के 
अपने साथ न होने का एहसास दिला ही दिया हैं |
नहीं पुकारूंगी कभी तुम्हे , कभी नहीं |
बह जाओ जितना बह सकते हो मेरे रोम -रोम से 
जिस्म -को जिस्म ही रह जाने दो ,
ये दुनिया ये ही चाहती हैं |
मेरे चाहने न चाहने से कभी कुछ  हुआहैं क्या ?
इसीलिए कभी कुछ बदेलगा ,
ये सोच के ही में लागती रही
तेरे कदमो में गुहार ,
और तुमने 
मेरे स्नेह को परिभाषित कर दिया 
सहानुभूतियों में ,
केसे पुकारू तुम्हे अब ?
बह जाओ जितना बह सकते हो !



अनुभूति
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be pnah pyar hai aa ja.......

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